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24 जुलाई 2026leakagecoal

बिल पर बीस टन, कांटे पर अठारह — ये फ़र्क कहाँ जाता है

कोयले की चोरी भट्टे पर नहीं, रास्ते में होती है। कांटा स्लिप रखने भर से वो फ़र्क दिखने लगता है — और दिखते ही कम हो जाता है।

ज़्यादातर भट्टों पर कोयले का हिसाब बिल से बनता है। बिल पर जो लिखा है, वही स्टॉक में चढ़ जाता है।

दिक़्क़त ये है कि बिल ऑर्डर बताता है, डिलीवरी नहीं। असली मात्रा कांटे पर तुलती है, और वहीं फ़र्क खुलता है। बीस टन के ऑर्डर पर अठारह-चार टन आना आम बात है। एक-दो टन का फ़र्क छोटा लगता है — मौजूदा भाव पर वो पंद्रह हज़ार रुपये है, हर लोड पर।

इसका इलाज तकनीक नहीं, आदत है: हर लोड की कांटा स्लिप रखो और उसे उसी खरीद से जोड़ो। दो-चार लोड के बाद पैटर्न साफ़ दिखने लगता है — कौन-सा वेंडर हमेशा कम देता है, और किसका फ़र्क शून्य के आस-पास रहता है।

हमारे यहाँ ये हिसाब अपने आप बनता है: बिल की मात्रा, कांटे की मात्रा, फ़र्क, और उस फ़र्क की क़ीमत — हर लोड और हर वेंडर पर।

भट्टा टीम