3 जुलाई 2026labourpeshgi
पेशगी का हिसाब सीज़न के आख़िर में क्यों बिगड़ता है
झगड़ा रकम पर नहीं होता, याददाश्त पर होता है। रोज़ का हिसाब लिखा हो तो आख़िरी दिन बस जोड़ना बचता है।
सीज़न के आख़िर में मज़दूर और ठेकेदार के साथ हिसाब बैठता है। पेशगी कितनी दी, खर्ची कितनी गई, और पथाई-निकासी का कितना बना।
झगड़ा लगभग हमेशा एक ही जगह से शुरू होता है: कोई एक रकम जो कॉपी में नहीं चढ़ी। पाँच सौ रुपये जो जेब से दिए गए, या एक हफ़्ता जिसका हिसाब बाद में करने के लिए छोड़ दिया गया। छह महीने बाद दोनों तरफ़ की याददाश्त अलग होती है, और दोनों ईमानदार होते हैं।
इसका हल आख़िरी दिन का नहीं, रोज़ का है। हर पेशगी उसी दिन दर्ज हो, और मज़दूर को उसी वक़्त पता चले कि अब तक कितना बना और कितना कटा।
इससे दो चीज़ें होती हैं। सीज़न के आख़िर में हिसाब सिर्फ़ जोड़ रह जाता है। और मज़दूर को हर हफ़्ते अपनी स्थिति दिखती है — जो अपने आप में उसे टिकाए रखता है।